Important Links
जितेंद्र दहिया
जितेंद्र दहिया हलालपुर, सोनीपत से संबंध रखते हैं। हरियाणवी में रचनाएं लिखते हैं।
Author's Collection
Total Number Of Record :2शर्म लाज कति तार बगायी
शर्म लाज कति तार बगायी या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी...!
कट्ठे रह के कोए राजी कोनया ब्याह करते ए न्यारे पाटे हैं,
माँ बाप की कोए सेवा नहीं करता सारे राखन त नाटे है ।
भाना की कोए कदर रही ना, साली ए प्यारी लागे है ,
सीधे कोथली भी देना नहीं चाहते ज़िम्मेदारी त भागे हैं ।
साली रोज घरा खड़ी रह बेबे जाती नहीं बुलाई ,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी... ।
बाजरे की रोटी भाती कोनया इब बर्गर पिज्जा खावें स ,
नशे पते के आदी होगे हुक्के न शान बतावें स .... ।
लाम्बे ठाड़े बालक खुगे ये त किसता प जीवें स ,
दूध दहि त कत्ती छूट गया शीत भी मांगया पीवें स ।
लूट खसोट भी गणही माचगी ना रही मेहनत की कमाई ,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी ... ।
कड़े दोगड़ धर धर ल्याया करती इब बाल्टी म बा आवे स ,
घर ना हो चाहे दाने खान न काम करण आली आवे स ।
पहल्या 4 बजे उठ जाया करती इब 10 बजे ताई सोना चावे स ,
देख के सिर शर्म त झुक ज्या सासु न काम बतावे स....
ईवनिंग वॉक प जान लाग गी इब गामा की लुगाई
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी ... ।
बुड्ढे भी इब वे ना रहे कोए सयानी बात रही ना
किसे आती जाती न देख के बुझे किसकी बहू भाई या...?
बुड्ढे भी कति बालक होगे छोटी सी बात प ऐंठे स ,
भीरस्पत न लुगाई देखन खातर मंदिर प जा के बैठे स ।
ये भी न्यू कह अक टेम बदल गया ना रही माहरी किते सुनाई
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी... ।
बिमार बहु का भी हाथ नहीं बटावे सतसंग में जाके झाड़ू ठावे है,
घाल कै कुर्सी बैठ भारणे आते ज्याता की चुगली लावे है।
भजन कीर्तन छोडके इब नाटका मै ध्यान लगावे है,
छोरा बटेऊ दोनू बस मै सारी बुढिया न्यू चावे है।
बहु ऐ क्यूँ ना इनने अपनी बेटी बनायीं,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी... ।
छोरी घर तै बाहर लिकड़ कै घनिये धरती काटे है,
माँ घरा कोए काम बतादे झट दे सी नै नाटे है।
छोटे छोटे लत्ते पहरणन ये फैशन बतावे है,
गलत चालण पै भी टोको मतना सारी छोरी न्यू चावे है।
लव मैरिज करण ताहि इनने घर मै करी लड़ाई,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी।
पहल्या आला पड़ोस रहया ना जिब,
राज़ी ख़ुशी रहया करे थे।
दुःख सुख मै जिब एक दूजे का पूरा साथ दिया करे थे,
देख कै इब का हाल मेरा दिल यो कत्ति टूट जया है।
कदे ओट्ड़े पै कदे नाली पै जिबे लठ उठ जया है,
कह 'जितेन्द्र' ना रही किसे मै थोड़ी सी भी समायी,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी... ।
मेहनत करके कोए राज़ी कोन्या पहल्या सारा दिन हल चलाया करते,
रोग बिमारी दूर रहवे थी मेहनत करके खाया करते।
पहल्या पैर उट्ठे थे महीने भर मै इब 2 दिन का काम भी बसकी कोन्या,
जो सपना देख्या था छोटूराम नै यो वो हरयाणा कोन्या।
सब किम हो गया महँगा ना रही खेती मै कोए कमाई,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी... ।
प्यार प्रेम राखो आपस म सब रह ल्यों बढ़िया तरिया,
के बेरा कद रुक ज्यावे यो किसके वक्त का पहिया।
"जितेन्द्र नाम है मेरा एक त जाट ऊपर त दहिया ॥"
शर्म लाज कति तार बगायी या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी...!!
--जितेंद्र दहिया
...
बचपन का टेम
बचपन का टेम याद आ गया कितने काच्चे काटया करते,
आलस का कोए काम ना था भाजे भाजे हांड्या करते ।
माचिस के ताश बनाया करते कित कित त ठा के ल्याया करते
मोर के चंदे ठान ताई 4 बजे उठ के भाज जाया करते ।
ठा के तख्ती टांग के बस्ता स्कूल मे हम जाया करते,
स्कूल के टेम पे मीह बरस ज्या सारी हाना चाहया करते ।
गा के कविता सुनाके पहड़े पिटन त बच जाया करते,
राह म एक जोहड़ पड़े था उड़े तख्ती पोत ल्याया करते ।
"राजा की रानी रुससे जा माहरी तख्ती सूखे जा" कहके फेर सुखाया करते ,
नयी किताब आते ए हम असपे जिलत चड़ाया करते ।
सारे साल उस कहण्या फेर ना कदे खोल लखाया करते ,
बोतल की खाते आइसक्रीम हम बालां के मुरमुरे खाया करते ।
घरा म सबके टीवी ना था पड़ोसिया के देखन जाया करते
ज कोए हमने ना देखन दे फेर हेंडल गेर के आया करते ।
भरी दोफारी महस खोलके जोहड़ पे ले के जाया करते ,
बैठ के ऊपर या पकड़ पूछ ने हम भी बित्तर बड़ जाया करते ।
साँझ ने खेलते लुहकम लुहका कदे आती पाती खेलया करते,
कदे चंदगी की कदे चंदरभान की डांटा न हम झेलया करते ।
बुआ आर काका भी माहरे खूब ए लाड़ लड़ाया करते,
जब होती कदे पिटाई त बाबू ध्होरे छुड़वाया करते ।
खेता कहण्या जा के फेर नलके टूबेल पे नहाया करते,
चूल्हे ध्होरे बैठ के रोटी घी धर धर के खाया करते ।
होती फेर सोवन की तयारी दादा दादी कहानी सुनाया करते,
बिजली त कदे आवे ना थी बस बिजना हलाया करते ।
हल्की हल्की सी हवा लागती हमते फेर सो जाया करते,
तड़के न जब आँख खुलती सारे ऊट्ठे पाया करते ।
दूसरी खाटा के गुददड़े बत्ती सीले से पाया करते,
छोड़के अपनी खाट न दूसरी पे हटके सो जाया करते ।
जांगड़ा तू क्यां मै बड ग्या जा के कोए ईंट लगा ले न,
ज ईंट लगानी बसकी कोनया आरी राँड़ा ठाले न ।
यो शायरी का काम छोड़ दे इसने मै संभालूँगा,
औरा की त बात छोड़ तेरे पे भी वाह वाह कहवा ल्यूङ्गा ।
लिखण की कोए इच्छा ना थी उकसाया जांगड़ा भैया न।
जिद्दा म ये लाइन बना दी जितेंद्र नाम के दहिया न ॥
-जितेन्द्र दहिया
...
सब्स्क्रिप्शन
ताऊ बोल्या
