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म्हारा हरियाणा : हरियाणवी लोक साहित्य, संस्कृति एवं भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु
बचपन का टेम (काव्य)    Print this  
Author:जितेंद्र दहिया

बचपन का टेम याद आ गया कितने काच्चे काटया करते,
आलस का कोए काम ना था भाजे भाजे हांड्या करते ।

माचिस के ताश बनाया करते कित कित त ठा के ल्याया करते
मोर के चंदे ठान ताई 4 बजे उठ के भाज जाया करते ।

ठा के तख्ती टांग के बस्ता स्कूल मे हम जाया करते,
स्कूल के टेम पे मीह बरस ज्या सारी हाना चाहया करते ।

गा के कविता सुनाके पहड़े पिटन त बच जाया करते,
राह म एक जोहड़ पड़े था उड़े तख्ती पोत ल्याया करते ।

"राजा की रानी रुससे जा माहरी तख्ती सूखे जा" कहके फेर सुखाया करते ,
नयी किताब आते ए हम असपे जिलत चड़ाया करते ।

सारे साल उस कहण्या फेर ना कदे खोल लखाया करते ,
बोतल की खाते आइसक्रीम हम बालां के मुरमुरे खाया करते ।

घरा म सबके टीवी ना था पड़ोसिया के देखन जाया करते
ज कोए हमने ना देखन दे फेर हेंडल गेर के आया करते ।

भरी दोफारी महस खोलके जोहड़ पे ले के जाया करते ,
बैठ के ऊपर या पकड़ पूछ ने हम भी बित्तर बड़ जाया करते ।

साँझ ने खेलते लुहकम लुहका कदे आती पाती खेलया करते,
कदे चंदगी की कदे चंदरभान की डांटा न हम झेलया करते ।

बुआ आर काका भी माहरे खूब ए लाड़ लड़ाया करते,
जब होती कदे पिटाई त बाबू ध्होरे छुड़वाया करते ।

खेता कहण्या जा के फेर नलके टूबेल पे नहाया करते,
चूल्हे ध्होरे बैठ के रोटी घी धर धर के खाया करते ।

होती फेर सोवन की तयारी दादा दादी कहानी सुनाया करते,
बिजली त कदे आवे ना थी बस बिजना हलाया करते ।

हल्की हल्की सी हवा लागती हमते फेर सो जाया करते,
तड़के न जब आँख खुलती सारे ऊट्ठे पाया करते ।

दूसरी खाटा के गुददड़े बत्ती सीले से पाया करते,
छोड़के अपनी खाट न दूसरी पे हटके सो जाया करते ।

जांगड़ा तू क्यां मै बड ग्या जा के कोए ईंट लगा ले न,
ज ईंट लगानी बसकी कोनया आरी राँड़ा ठाले न ।

यो शायरी का काम छोड़ दे इसने मै संभालूँगा,
औरा की त बात छोड़ तेरे पे भी वाह वाह कहवा ल्यूङ्गा ।

लिखण की कोए इच्छा ना थी उकसाया जांगड़ा भैया न।
जिद्दा म ये लाइन बना दी जितेंद्र नाम के दहिया न ॥

-जितेन्द्र दहिया

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